शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

उपमान करूँ किससे तेरा

दाग चन्द्रमा में भी है, उपमान करूँ किससे तेरा
पुष्पों से भी हैं बद्ध भ्रमर, कैसे कह दूं है अधर तेरा
कहता हूँ यदि गंगाजल मैं ,तो निर्मल नहीं है वो तुझ सा
कहता हूँ जो कल्पना मेरी, तो भी सच नहीं है ये तेरा
तुमको जो मैं परी कहूं, तो देखा नहीं है मुख उसका
तुमको 'आँखों का नूर' कहूं, तो आँखों में छिप जाओगे
फिर मेरे सिवा तुम किसी और को, कभी नज़र ना आओगे
कहता हूँ हृद-स्पंदन हो, मेरे दिल को धड़काने वाले
मेरे नयनों का हो स्वप्न तुम्हीं, मेरे स्वप्नों में आने वाले
स्वर्ग की कोई परी कहाँ, जो तेरे सम्मुख आएगी
देख तेरे तन-मन को वो, आँचल में तेरे छिप जाएगी
तेरी सच्चाई लिखता हूँ पर समझ ना आया मुझको ये
तेरा समतुल्य है कौन यहाँ, उपमान करूँ तेरा किस्से ?
                                    उपमान करूँ तेरा किस्से?